Sadhana Shahi

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लेखनी कहानी -18-Feb-2024

दिनांक- 18.0 2 .2024 दिवस- रविवार प्रदत्त विषय- श्रापित गांँव (प्रतियोगिता हेतु)

यह बात उस समय की है जब सुनील बाबू के यहाँ एक तरफ़ गन्ने की पेराई चल रही थी और दूसरी तरफ़ गुड़ का कराह चढ़ा हुआ था। ताज़ा- ताज़ा गुड़ बन रहा था। गुड़ की भीनी-भीनी ख़ुशबू दूर-दराज तक फ़ैल रही थी, तथा गरीबों के मन को अनायास अपनी तरफ़ आकर्षित कर रही थी।

उसी आकर्षित होने वाले में एक बच्चा था रमुआ। रमुआ को गुड़ की ख़ुशबू ने अपनी तरफ़ इतना आकर्षित किया कि वह गुड़ के कराह के पास आकर चुप-चाप एकटक कराह को देखने लगा।

तभी वहांँ पर सुनील बाबू आ गए। उन्होंने आकर पूछा, का रे रमुआ ऐसे कैसे कराह को देख रहा है। रमुआ कुछ नहीं बोला। सुनील बाबू ने फिर से पूछा, तब रमुआ सुनील बाबू का मुंँह देखने लगा। सुनील बाबू ने पूछा, क्या बात है खाने का मन कर रहा है? रमुआ ने हाँ में सर हिला दिया।

तभी सुनील बाबू को एक शरारत सूझी। वो बगल में दौरे में रखे हुए गुड़ की तरफ़ (करीब 6 से 7 किलो था) इशारा करते हुए बोले, यदि तू यह सारा गुड़ खा लेगा तो मैं तुझे ₹1000 दूंँगा। क्या तू खा सकता है? रमुआ ने फिर से हाँ में सिर हिला दिया।

तभी सुनील बाबू ने अपने एक गुड़ बनाने वाले मज़दूर से कहा, तुम इसे सारा गुड़ दे दो। यदि यह सारा गुड़ खा लेगा तो मुझे आकर बताना। मज़दूर ने रमुआ को गुड़ का दौरा दे दिया। बेचारा था तो बच्चा एक दो,किलो गुड़ खाते-खाते उसकी हालत पस्त हो गई। लेकिन ₹1000 के लालच ने उसे गुड़ न छोड़ने पर मज़बूर कर रखा था। धीरे-धीरे, बैठे-बैठे दो-तीन घंटे में वह पूरा 6, 7 किलो गुड़ ख़त्म कर दिया। और मज़दूर से सुनील बाबू को बताने के लिए कहा। दरअसल अब उसे ₹1000 पाने की बेचैनी थी।

मज़दूर जाकर सुनील बाबू को बताया कि रमुआ ने पूरा गुड़ खा लिया। सुनील बाबू मज़दूर के मुंँह से यह बात सुनकर अवाक हो गये। उन्होंने मज़दूर से कहा, भगाओ साले को, इंसान का बच्चा है या दरिद्र! 6,7 किलो गुड़ सच्ची में खा गया। मजदूर ने कहा, हांँ साहब पूरा खा लिया। अब वह आपको ₹1000 के लिए बुला रहा है। सुनील बाबू ने कहा, कैसा ₹1000। साला गुड़ भी खा लिया और ₹1000 भी देंगे। भगाओ उसको मार के। मज़दूर ने आकर रमुआ को बताया कि सुनील बाबू तुम्हें कोई रुपए नहीं देंगे। उन्होंने तो तुमसे सिर्फ़ मज़ाक किया था और तुम सचमुच का सारा गुड़ खा गए। यह सुनकर रमुआ को बड़ा ही दुख हुआ। वह रोते हुए अपने घर को गया और घर जाकर बीमार पड़ गया। उसे उल्टियांँ और टट्टी होने लगीं। उल्टियांँ टट्टी एक बार जो शुरू हुईं तो तभी बंद हुईं जब उसका शरीर निष्प्राण हो गया।

जब सुनील बाबू को यह ख़बर मिली की गुड़ खाने से बीमार पड़कर रमुआ की मृत्यु हो गई। तब उन्होंने आनन-फानन में उसके माता-पिता को डरा धमकाकर उनका मुंँह बंद करि दिया और रमुआ की लाश को गांँव के बाहर एक जगह दफ़ना दिया।

रमुआ के गरीब मांँ-बाप अपने आंँसू को पी गए और पूरे गांँव में यह हल्ला हो गया कि रमुआ कहीं भाग गया।

समय बीता अगली वर्ष फ़िर से गुड़ बनाने का समय आया। लेकिन यह क्या! इस वर्ष जिसके यहांँ भी गन्ने की पेराई हो उसके रस का रंग ख़ून की तरह लाल हो जाए। यदि सौभाग्य से किसी के रस का रंग लाल नहीं हुआ तो जब गुड़ का कराह चढ़े उसमें अनायास ही धूल- मिट्टी पड़ जाए। सुनील बाबू के पूरे शरीर पर गुड़ की तरह ही घाव निकलने लगा।

लोग परेशान थे आख़िर यह हो क्या रहा है। गुड़ तो हर साल बनता था लेकिन इस साल जैसे अनहोनी तो कभी नहीं घटित होती थी। अंत में गांँव के सभी लोगों ने मिलकर एक बहुत ही जानकार पंडित को दिखाया। तब पंडित ने रमुआ के साथ घटित पूरी घटना को बता दिया। और बताया कि इस इस गांँव को रमुआ का श्राप लगा है। यह पूरा गांँव श्रापित हो गया है। गांँव वालों ने पूछा, पंडित जी इससे हमें निजात कैसे मिलेगा? अगर ऐसे ही चलता रहा तो, हमारी तो गन्ने की खेती ही बंद हो जाएगी।

(सुनील बाबू कुछ नहीं कह रहे थे। वो सिर्फ़ सबकी बातें सुन रहे थे। क्योंकि उन्हें शायद समझ में आ रहा था कि यह सब रमुआ की ही करतूत है।)

तब पंडित जी ने कहा इसका सिर्फ़ एक ही उपाय है पूरा गांँव मिलकर गुड़हवा रमुआ बाबा नाम का एक भव्य मंदिर बनवाए और जिस दिन रमुआ की मृत्यु हुई उस दिन वहांँ पर दूर- दराज के ग़रीबों को बैठाकर गुड़ से बना पकवान खिलाए तथा रमुआ को पूरा गांँव पूजे और उसे भोग में गुड़ तथा गुड़ से बनी हुई वस्तुएंँ चढ़ाए।

और हांँ सुनील बाबू यह सब कुछ आपका किया धरा है। अतः आप जाकर रमुआ के माता-पिता से माफ़ी मांँगिए। उन्हें घर, मकान, ज़मीन जिस चीज़ की ज़रूरत है वह दीजिए और आप घर- द्वार छोड़कर पुजारी के रूप में रमुआ के मंदिर में बैठिए। यदि आप लोग ऐसा कर पाएंँगे तभी यह गाँव श्राप मुक्त हो पाएगा।

पंडित जी की बात सुनकर पूरा गांँव एकजुट होकर रमुआ के लिए मंदिर बनवाया। पंडित जी के कहे अनुसार ग़रीबों को गुड़ से बने पकवान का भोजन कराना, उसे गुड़ का भोग लगाना इत्यादि सारे कार्य किए गए।

सुनील बाबू भी अपने कृत्य के पश्चात स्वरूप पंडित जी के कहे अनुसार रमुआ के घर जाकर उनसे माफी मांँगे, उनका पक्का घर बनवाये, उसके मांँ-बाप को दो बीगहे ज़मीन दिये और स्वयं अपना घर-बार छोड़कर रमुआ के मंदिर में एक पुजारी का जीवन व्यतीत करने लगे। और इस तरह जब रमुआ को इंसाफ़ मिला, तब जाकर वह श्रापित गांँव श्राप मुक्त हो पाया।

सीख- अपनी मसख़री के लिए कभी भी किसी मासूम से ऐसा मज़ाक मत करिए कि उसे अपनी जान से हाथ धोना पड़े। तथा दूसरी बात बुरे काम का परिणाम सदा बुरा ही होता है भले ही वह कुछ दिनों तक छुप जाए लेकिन सदा के लिए कभी भी नहीं छुप सकता।

साधना शाही, वाराणसी

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3 Comments

Gunjan Kamal

20-Feb-2024 03:15 PM

👌🏻👏🏻

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Mohammed urooj khan

19-Feb-2024 12:19 PM

शानदार कहानी mam 👌🏾👌🏾👌🏾

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Rupesh Kumar

18-Feb-2024 05:27 PM

बहुत खूब

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